L-3: संविधान सभा का गठन और निर्माण प्रक्रिया - संपूर्ण विश्लेषण (UPSC/MPPSC Special)

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✍️ विषय विशेषज्ञ (Subject Expert):

सी पी रावत सर (CP Rawat Sir)

"अवधारणात्मक स्पष्टता (Conceptual Clarity) और सटीक विश्लेषण के साथ सिविल सेवा की तैयारी।"


👋 नमस्कार दोस्तों! "GK GS by CP Rawat" मंच पर आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है। सिविल सेवा परीक्षाओं (UPSC, MPPSC Mains + Prelims) के बदलते पैटर्न को ध्यान में रखते हुए, आज हम राजव्यवस्था का सबसे आधारभूत टॉपिक पढ़ने जा रहे हैं — "संविधान सभा का गठन, कार्यप्रणाली एवं उसकी आलोचनात्मक समीक्षा"। इस क्लास के बाद आपको किसी अन्य किताब को छूने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि इसमें सभी प्रामाणिक तथ्यों और वैचारिक दृष्टिकोणों को सम्मिलित किया गया है। 📚🔥


📌 1. पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक विकास (Historical Background)

भारत में संविधान सभा की मांग का इतिहास ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार की अभिव्यक्ति था। मुख्य परीक्षा (Mains) के दृष्टिकोण से इसका क्रमबद्ध विकास निम्न प्रकार है:

  • 💡 सर्वप्रथम विचार (1934): भारत में संविधान सभा के गठन का पहला औपचारिक विचार वामपंथी आंदोलन के प्रणेता एम. एन. राय (M.N. Roy) द्वारा प्रस्तुत किया गया था।
  • 📜 कांग्रेस की आधिकारिक मांग (1935): भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पहली बार अपने आधिकारिक मंच से भारत के संविधान निर्माण के लिए एक संप्रभु संविधान सभा की मांग की।
  • 🗣️ नेहरू का उद्घोष (1938): जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की कि, "स्वतंत्र भारत का संविधान बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के, वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गई संविधान सभा द्वारा बनाया जाना चाहिए।"
  • 🎁 अगस्त प्रस्ताव (1940): ब्रिटिश सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध की मजबूरियों के कारण पहली बार भारतीयों की इस मांग को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया, जिसे 'अगस्त प्रस्ताव' कहा जाता है।
  • 🚫 क्रिप्स मिशन (1942): सर स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स एक प्रारूप प्रस्ताव लेकर भारत आए, जिसे मुस्लिम लीग ने 'भारत के विभाजन' की मांग के कारण खारिज कर दिया और गांधी जी ने इसे "उत्तर-दिनांकित चेक" (Post-dated Cheque) कहा।

📌 2. कैबिनेट मिशन योजना एवं सभा की संरचना (Composition)

अंततः 1946 में आए कैबिनेट मिशन (Lord Pethick-Lawrence, Sir Stafford Cripps, A.V. Alexander) के प्रस्तावों के तहत संविधान सभा का गठन नवंबर 1946 में हुआ। इसकी बारीक संरचना को समझें:

⚖️ सीटों का विस्तृत वर्गीकरण (कुल सीटें: 389):
ब्रिटिश भारतीय प्रांत (11 प्रांत): 292 सीटें आवंटित की गईं।
मुख्य आयुक्त के प्रांत (Chief Commissioners): 4 सीटें (दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़, कुर्ग और ब्रिटिश बलूचिस्तान)।
देशी रियासतें (Princely States): 93 सीटें आवंटित की गईं (जिन्हें राजाओं द्वारा मनोनीत किया जाना था)।

⚠️ UPSC मुख्य परीक्षा हेतु विशेष अवधारणा (Conceptual Fact): संविधान सभा **आंशिक रूप से चुनी हुई** और **आंशिक रूप से मनोनीत** निकाय थी। इसके अलावा, सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा नहीं, बल्कि प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा 'अप्रत्यक्ष रूप से एकल संक्रमणीय मत' (Proportional Representation) पद्धति से हुआ था।

📌 3. संविधान सभा की कार्यप्रणाली एवं महत्वपूर्ण समितियां

📅 महत्वपूर्ण बैठकों का कालक्रम:

  • 🕒 9 दिसंबर 1946: प्रथम बैठक में केवल 211 सदस्यों ने भाग लिया (मुस्लिम लीग ने अलग पाकिस्तान की मांग पर बहिष्कार किया)। वरिष्ठतम सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष बनाया गया।
  • 🕒 11 दिसंबर 1946: डॉ. राजेंद्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष तथा एच.सी. मुखर्जी एवं वी.टी. कृष्णमाचारी को दो उपाध्यक्ष चुना गया। सर बी.एन. राव को विधिक (संवैधानिक) सलाहकार नियुक्त किया गया।
  • 🕒 13 दिसंबर 1946: नेहरू जी द्वारा **'उद्देश्य प्रस्ताव'** प्रस्तुत किया गया, जिसे 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया।

📐 प्रारूप समिति (Drafting Committee) का विस्तृत विवरण:

29 अगस्त 1947 को गठित इस समिति में **डॉ. बी.आर. अंबेडकर (अध्यक्ष)** के अलावा 6 अन्य सदस्य थे, जिनका नाम प्रीलिम्स के लिए अति-महत्वपूर्ण है:

  1. एन. गोपालस्वामी आयंगर
  2. अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर
  3. डॉ. के.एम. मुंशी
  4. सैयद मोहम्मद सादुल्लाह
  5. एन. माधव राव (इन्होंने बी.एल. मित्र का स्थान लिया, जिन्होंने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया था)
  6. टी.टी. कृष्णमाचारी (इन्होंने 1948 में डी.पी. खेतान की मृत्यु के बाद उनका स्थान लिया)

📌 4. संविधान सभा की वैचारिक आलोचना (Critical Analysis for Mains)

UPSC मुख्य परीक्षा में अक्सर यह सवाल आता है कि क्या संविधान सभा एक संप्रभु और प्रतिनिधि संस्था थी? इतिहासकारों और आलोचकों ने इसके विरुद्ध निम्नलिखित तर्क दिए हैं, जिन्हें आपको उत्तर में लिखना होगा:

आलोचना के मुख्य बिंदु:
1. यह प्रतिनिधि निकाय नहीं थी: आलोचकों का मानना है कि इसके सदस्यों का चुनाव भारत की जनता द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया गया था।
2. संप्रभुता का अभाव: चर्चिल और अन्य ब्रिटिश आलोचकों ने कहा कि इस सभा का गठन ब्रिटिश सरकार के प्रस्तावों के आधार पर हुआ था, इसलिए यह पूर्णतः संप्रभु नहीं थी।
3. समय की बर्बादी: संविधान सभा के सदस्य नज़रुद्दीन अहमद ने प्रारूप समिति को 'अपवहन समिति' (Drifting Committee) कहा क्योंकि इसने बहुत लंबा समय (2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन) लिया, जबकि अमेरिका का संविधान मात्र 4 माह में बन गया था।
4. कांग्रेस का प्रभुत्व: ब्रिटिश राजनीतिज्ञ ग्रैनविले ऑस्टिन ने टिप्पणी की थी कि- "संविधान सभा एक दलीय देश का एक दलीय निकाय थी। सभा ही कांग्रेस थी और कांग्रेस ही भारत था।"
5. वकीलों और राजनीतिज्ञों का प्रभुत्व: समाज के अन्य वर्गों (जैसे मजदूर, किसान) को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला, इसीलिए हमारा संविधान अत्यंत विस्तृत और कानूनी भाषा से जटिल हो गया, जिसे 'वकीलों का स्वर्ग' कहा जाता है।
6. हिंदुओं का प्रभुत्व: लॉर्ड विस्काउंट साइमन ने इसे 'हिंदुओं की संस्था' कहा था, तथा विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि- "संविधान सभा ने भारत के केवल एक बड़े समुदाय का प्रतिनिधित्व किया।"

🎯 सिविल सेवा (UPSC/MPPSC) मुख्य परीक्षा एवं प्रारंभिक परीक्षा के अभ्यास प्रश्न 📝

Q 1. संविधान सभा के संदर्भ में 'एकल संक्रमणीय मत' पद्धति के द्वारा अप्रत्यक्ष चुनाव का क्या अर्थ है? (Conceptual)
✔ उत्तर:

इसका अर्थ है कि आम जनता ने सीधे वोट नहीं डाला, बल्कि जनता द्वारा प्रांतीय विधान सभाओं में जो प्रतिनिधि पहले से चुने गए थे, उन्होंने ही संविधान सभा के सदस्यों को चुना।

Q 2. ग्रैनविले ऑस्टिन का यह कथन कि "संविधान सभा ही कांग्रेस थी और कांग्रेस ही भारत था", किस मुख्य आलोचना को दर्शाता है? (Mains Oriented)
✔ उत्तर:

यह कथन संविधान सभा में 'एकदलीय प्रभुत्व' और अन्य छोटे राजनीतिक दलों व विचारधाराओं के कम प्रतिनिधित्व की आलोचना को दर्शाता है।

Q 3. संविधान सभा का मुख्य प्रशासनिक सलाहकार (Constitutional Advisor) किसे नियुक्त किया गया था? (Pre Fact)
✔ उत्तर: सर बी. एन. राव (Sir B.N. Rau) को।

💡 रावत सर का प्रामाणिक निष्कर्ष (Mains Answer Writing Tool): यद्यपि आलोचकों ने इसे गैर-प्रतिनिधि या वकीलों का वर्चस्व वाला निकाय कहा, किंतु यह आलोचना पूरी तरह तार्किक नहीं है। तत्कालीन विषम परिस्थितियों, सांप्रदायिक दंगों और देश के विभाजन के बीच इस सभा ने जिस बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से विभिन्न विचारधाराओं में समन्वय स्थापित किया, उसी का परिणाम है कि हमारा संविधान आज भी अक्षुण्ण बना हुआ है। यह भारत की विविधता और एकता का एक आदर्श दस्तावेज है।

💬 प्रिय अभ्यर्थियों, यूपीएससी और एमपीपीएससी स्तर का यह संपूर्ण और विस्तृत विश्लेषण आपको कैसा लगा? अपने विचार और कोई भी संशय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। इस ज्ञान को अपने मित्रों के साथ शेयर करना न भूलें। पढ़ते रहिए, आगे बढ़ते रहिए! धन्यवाद! 🙏✨

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